गौतम बुद्ध की कहानियाँ

गौतम बुद्ध की कहानियाँ | प्रेरणादायक कथाए | बुद्ध कथाएं २०२१

Motivation Gautam Buddha Stories

गौतम बुद्ध की कहानियाँ

गौतम बुद्ध की कहानियाँ

लक्खण मृग 


हजारों साल पहले मगध जनपद के एक निकटवर्ती वन में हजार हिरणों का एक समूह रहता था जिसके राजा के दो पुत्र थे- लक्खण और काल। जब मृगराज वृद्ध होने लगा तो उसने अपने दोनों पुत्रों को उत्तराधिकारी घोषित किया और प्रत्येक के संरक्षण में पाँच-पाँच सौ मृग प्रदान किए ताकि वे सुरक्षित आहार-विहार का आनंद प्राप्त कर सकें।

उन्हीं दिनों फसल काटने का समय भी निकट था तथा मगधवासी अपने लहलहाते खेतों को आवारा पशुओं से सुरक्षित रखने के लिए अनेक प्रकार के उपक्रम और खाइयों का निर्माण कर रहे थे। मृगों की सुरक्षा के लिए वृद्ध पिता ने अपने दोनों पुत्रों को अपने मृग-समूहों को लेकर किसी सुदूर और सुरक्षित पहाड़ी पर जाने का निर्देश दिया।

काला एक स्वेच्छाचारी मृग था। वह तत्काल अपने मृगों को लेकर पहाड़ी की ओर प्रस्थान कर गया। उसने इस बात की तनिक भी परवाह नहीं की कि लोग सूरज की रोशनी में उनका शिकार भी कर सकते थे। फलत: रास्ते में ही उसके कई साथी मारे गये।

 लक्खण एक बुद्धिमान और प्रबुद्ध मृग था। उसे यह ज्ञान था कि मगधवासी दिन के उजाले में उनका शिकार भी कर सकते थे। अत: उसने पिता द्वारा निर्दिष्ट पहाड़ी के लिए रात के अंधेरे में प्रस्थान किया। उसकी इस बुद्धिमानी से उसके सभी साथी सुरक्षित पहाड़ी पर पहुँच गए। 

चार महीनों के बाद जब लोगों ने फसल काट ली तो दोनों ही मृग-बन्धु अपने-अपने अनुचरों के साथ अपने निवास-स्थान को लौट आये। जब वृद्ध पिता ने लक्खण के सारे साथियों को जीवित और काला के अनेक साथियों के मारे जाने का कारण जाना तो उसने खुले दिल से लक्खण की बुद्धिमत्ता की भूरि-भूरि प्रशंसा की।


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इस दुनिया में कोई गरीब नहीं


एक समय की बात है भगवान गौतम बुद्ध एक गाँव में धर्म सभा को संबोधित कर रहे थे। लोग अपनी विभिन्न परेशानियों को लेकर उनके पास जाते और उसका हल लेकर खुशी-खुशी वहां से लौटते। उसी गांव के सड़क के किनारे एक गरीब व्यक्ति बैठा रहता तथा महात्मा बुद्ध के उपदेश शिविर में आने जाने वाले लोगों को बड़े ध्यान से देखता। उसे बड़ा आश्चर्य होता कि लोग अंदर तो बड़े दुःखी चेहरें लेकर जाते है लेकिन जब वापस आते है तो बड़े खुश और प्रसन्न दिखाई देते है।

उस गरीब को लगा कि क्यों न वो भी अपनी समस्या को भगवान के समक्ष रखे? मन में यह विचार लिए वह भी महात्मा बुद्ध के पास पहुंचा। लोग पंक्तिबध खड़े होकर अपनी समस्या को बता रहे थे।

जब उसकी बारी आई तो उसने सबसे पहले महात्ममा बुद्ध को प्रणाम किया और फिर कहा – भगवान इस गाँव में लगभग सभी लोग खुश और समृध है। फिर मैं ही क्यो गरीब हूं?

इस पर उन्होने मुस्कुराते हुए कहा – तुम गरीब और निर्धन इसलिए हो क्योंकि तुमने आज तक किसी को कुछ दिया ही नहीं।

इस पर वह गरीब व्यक्ति बड़ा आर्श्चयचकित हुआ और बोला – भगवान, मेरे पास भला दूसरों को देने के लिए क्या होगा। मेरा तो स्वयं का गुजारा बहुत मुश्किल से हो पाता है। लोगों से भीख मांग कर अपना पेट भरता हूं।

भगवान बुद्ध कुछ देर शांत रहे, फिर बोले- तुम बड़े अज्ञानी हो। औरो के साथ बाटने के लिए ईश्वर ने तुम्हे बहुत कुछ दिया है। मुस्कुराहट दी है जिससे तुम लोगों में आशा का संचार कर सकते हो। मुख दिया है ताकि लोगों से दो मीठे शब्द बोल सकते है, उनकी प्रशंसा कर सकते हो। दो हाथ दिये है लोगों की मदद कर सकते हो। ईश्वर ने जिसको ये तीन चीजें दी है वह कभी गरीब और निर्धन हो ही नहीं सकता। निर्धनता का विचार आदमी के मन में होता है, यह तो एक भ्रम है इसे निकाल दो।

कभी भी मन में निर्धनता का भाव उत्पन्न न होने दो गरीबी अपने आप दूर हो जाएगी | भगवान बुद्ध का संदेश सुनकर उस आदमी का चेहरा चमक उठा और उसने इस उपदेश को अपने जीवन में उतारा जिससे वह फिर कभी दुखी नहीं हुआ।


गौतम बुद्ध की कहानियाँ 2021

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अपने दुःखों का कारण आप ही है


एक समय की बात है, भगवान बुद्ध एक नगर में घुम रहे थे। उस नगर के आम नागरिकों के मन में बुद्ध के विरोधियों ने यह बात बैठा दी थी कि वह एक ढोंगी है और हमारे धर्म को भ्रष्ट कर रहा है। इस वजह से वहां के लोग उन्हें अपना दुश्मन मानते थे। जब नगर के लोगों ने बुद्ध को देखा तो उन्हें भला बुरा कहने लगे और बदुआएं देने लगे।

गौतम बुद्ध नगर के लोगों की उलाहने शांति से बिना बोलने सुनते रहे लेकिन जब नगर के लोग उन्हें बोलते-बोलते थक गए तो महात्मा बुद्ध बोले- “क्षमा चाहता हूं! लेकिन अगर आप लोगों की बातें खत्म हो गयी है तो मैं यहां जाऊं।”

भगवान बुद्ध कि यह बात सुन वहां के लोग बड़े आर्श्चयचकित हुए। वही खड़ा एक आदमी बोला – “ओ! भाई हम तुम्हारा गुणगान नहीं कर रहे है। हम तो तुम्हें गालियाँ दे रहे हैं। क्या इसका तुम पर कोई असर नहीं होता???”

बुद्ध बोले – आप सब मुझे चाहे जितनी गालियाँ दो मैं उन्हें लूगा ही नहीं। आपके गालियाँ देने से मुझपर कोई असर नहीं पड़ता जब तक कि मैं उन्हें स्वीकार नहीं करता।

बुद्ध आगे बोले – और जब मैं इन गालियाँ को लूंगा ही नहीं तो यह कहां रह जाएगी? निश्चित ही आपके पास।


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कन्या अछूत नहीं होती


एक बार वैशाली नगर के बाहर जाते हुए गौतम बुद्ध ने देखा कि कुछ सैनिक तेजी से भागती हुई एक लड़की का पीछा कर रहे हैं। वह डरी हुई लड़की एक कुएं के पास जाकर खड़ी हो गई। वह हांफ रही थी और प्यासी भी थी। बुद्ध ने उस बालिका को अपने पास बुलाया और कहा कि वह उनके लिए कुएं से पानी निकाले, खुद भी पिए और उन्हें भी पिलाए। इतनी देर में सैनिक भी वहां पहुंच गए। बुद्ध ने उन सैनिकों को हाथ के संकेत से रुकने को कहा।

उनकी बात पर वह लड़की कुछ झेंपती हुई बोली महाराज मै एक अछूत कन्या हूं। मेरे कुएं से पानी निकालने पर जल दूषित हो जाएगा। बुद्ध ने उस से फिर कहा पुत्री, बहुत जोर की प्यास लगी है, पहले तुम पानी पिलाओ। इतने में वैशाली के राजा भी वहां आ पहुंचे। उन्होंने बुद्ध को प्रणाम किया और सोने के बर्तन में केवड़े और गुलाब का सुगंधित पानी पेश किया। बुद्ध ने उसे लेने से इंकार कर दिया। एक बार फिर बालिका से अपनी बात कही। इस बार बालिका ने साहस बटोरकर कुएं से पानी निकल कर खुद भी पिया और गौतम बुद्ध को भी पिलाया।

पानी पीने के बाद बुद्ध ने बालिका से भय का कारण पूछा। लड़की ने बताया मुझे संयोग से राजा के दरबार में गाने का अवसर मिला था। राजा ने मेरा गीत सुन मुझे अपने गले की माला पुरस्कार में दी, लेकिन उन्हें किसी ने बताया कि मै अछूत लड़की हूं। यह पता चलते ही उन्होंने अपने सिपाहियों को मुझे कैद खाने में डाल देने का आदेश दिया। मै किसी तरह उनसे बचकर यहां तक पहुंची थी। इस पर बुद्ध ने कहा, सुनो राजन! यह लड़की अछूत नहीं है, आप अछूत हैं। जिस बालिका के मधुर कंठ से निकले गीत का आपने आनंद उठाया, उसे पुरस्कार दिया, वह अछूत हो ही नहीं सकती। गौतम बुद्ध की ये बात सुनकर राजा लज्जित महसूस करने लगे।


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महान् मत्स्य


श्रावस्ती के निकट जेतवन में कभी एक जलाशय हुआ करता था। उसमें एक विशाल मत्स्य का वास था। वह शीलवान्, दयावान् और शाकाहारी था।

उन्हीं दिनों सूखे के प्रकोप के उस जलाशय का जल सूखने लगा। फलत: वहाँ रहने वाले समस्त जीव-जन्तु त्राहि-त्राहि करने लगे। उस राज्य के फसल सूख गये । मछलियाँ और कछुए कीचड़ में दबने लगे और सहज ही अकाल-पीड़ित आदमी और पशु-पक्षियों के शिकार होने लगे । अपने साथियों की दुर्दशा देख उस महान मत्स्य की करुणा मुखर हो उठी । उसने तत्काल ही वर्षा देव पर्जुन का आह्मवान् अपनी सच्छकिरिया के द्वारा किया। पर्जुन से उसने कहा, “हे पर्जुन अगर मेरा व्रत और मेरे कर्म सत्य-संगत रहे हैं तो कृपया बारिश करें।” उसकी सच्छकिरिया अचूक सिद्ध हुई। वर्षा देव ने उसके आह्मवान् को स्वीकारा और सादर तत्काल भारी बारिश करवायी। इस प्रकार उस महान और सत्यव्रती मत्स्य के प्रभाव से उस जलाशय के अनेक प्राणियों के प्राण बच गये।


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छद्दन्त हाथी


हिमालय के घने वनों में कभी सफेद हाथियों की दो विशिष्ट प्रजातियाँ हुआ करती थीं – छद्दन्त और उपोसथ। छद्दन्त हाथियों का रंग सफेद हुआ करता था और उनके छ: दाँत होते थे। (ऐसा पालि साहित्य मे उल्लिखित है।) छद्दन्त हाथियों का राजा एक कंचन गुफा में निवास करता था। उसके मस्तक और पैर माणिक के समान लाल और चमकीले थे। उसकी दो रानियाँ थी – महासुभद्दा और चुल्लसुभद्दा।

एक दिन गजराज और उसकी रानियाँ अपने दास-दासियों के साथ एक सरोवर में जल-क्रीड़ा कर रहे थे। सरोवर के तट पर फूलों से लदा एक साल-वृक्ष भी था। गजराज ने खेल-खेल में ही साल वृक्ष की एक शाखा को अपनी सूंड से हिला डाला। संयोगवश वृक्ष के फूल और पराग महासुभद्दा को आच्छादित कर गये। किन्तु वृक्ष की सूखी टहनियाँ और फूल चुल्लसुभद्दा के ऊपर गिरे। चुल्लसुभद्दा ने इस घटना को संयोग न मान, स्वयं को अपमानित माना। नाराज चुल्लसुभद्दा ने उसी समय अपने पति और उनके निवास का त्याग कर कहीं चली गई। तत: छद्दन्तराज के अथक प्रयास के बावजूद वह कहीं ढूंढे नहीं मिली।

कालान्तर में चुल्लसुभद्दा मर कर मद्द राज्य की राजकुमारी बनी और विवाहोपरान्त वाराणसी की पटरानी। किन्तु छद्दन्तराज के प्रति उसका विषाद और रोष इतना प्रबल था कि पुनर्जन्म के बाद भी वह प्रतिशोध की आग में जलती रही। अनुकूल अवसर पर उसने राजा से छद्दन्तराज के दन्त प्राप्त करने को उकसाया। फलत: राजा ने उक्त उद्देश्य से कुशल निषादों की एक टोली बनवाई जिसका नेता सोनुत्तर को बनाया।

सात वर्ष, सात महीने और सात दिनों के पश्चात् सोनुत्तर छद्दन्तराज के निवास-स्थान पर पहुँचा। उसने वहाँ एक गड्ढा खोदा और उसे लकड़ी और पत्तों से ढ्ँक दिया। फिर वह चुपचाप पेड़ों की झुरमुट में छिप गया। छद्दन्तराज जब उस गड्ढे के करीब आया तो सोनुत्तर ने उस पर विष-बुझा बाण चलाया।


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बुद्धिमान् वानर


हज़ारों साल पहले किसी वन में एक बुद्धिमान बंदर रहता था। वह हज़ार बंदरों का राजा भी था।’

एक दिन वह और उसके साथी वन में कूदते-फाँदते ऐसी जगह पर पहुँचे जिसके निकट क्षेत्र में कहीं भी पानी नहीं था। नयी जगह और नये परिवेश में प्यास से व्याकुल नन्हे वानरों के बच्चे और उनकी माताओं को तड़पते देख उसने अपने अनुचरों को तत्काल ही पानी के किसी स्रोत को ढूंढने की आज्ञा दी। कुछ ही समय के बाद उन लोगों ने एक जलाशय ढूंढ निकाला। प्यासे बंदरों की जलाशय में कूद कर अपनी प्यास बुझाने की आतुरता को देख कर वानरराज ने उन्हें रुकने की चेतावनी दी, क्योंकि वे उस नये स्थान से अनभिज्ञ था।

अत: उसने अपने अनुचरों के साथ जलाशय और उसके तटों का सूक्ष्म निरीक्षण व परीक्षण किया। कुछ ही समय बाद उसने कुछ ऐसे पदचिह्नों को देखा जो जलाशय को उन्मुख तो थे मगर जलाशय से बाहर को नहीं लौटे थे। बुद्धिमान् वानर ने तत्काल ही यह निष्कर्ष निकाला कि उस जलाशय में निश्चय ही किसी खतरनाक दैत्य जैसे प्राणी का वास था। जलाशय में दैत्य-वास की सूचना पाकर सारे ही बंदर हताश हो गये। तब बुद्धिमान वानर ने उनकी हिम्मत बंधाते हुए यह कहा कि वे दैत्य के जलाशय से फिर भी अपनी प्यास बुझा सकते हैं क्योंकि जलाशय के चारों ओर बेंत के जंगल थे जिन्हें तोड़कर वे उनकी नली से सुड़क-सुड़क कर पानी पी सकते थे। सारे बंदरों ने ऐसा ही किया और अपनी प्यास बुझा ली। जलाशय में रहता दैत्य उन्हें देखता रहा मगर क्योंकि उसकी शक्ति जलाशय तक ही सीमित थी, वह उन बंदरों का कुछ भी नहीं बिगाड़ सका । प्यास बुझा कर सारे बंदर फिर से अपने वन को लौट गये।


बुद्ध कथाएं

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रुरु मृग की कथा


रुरु एक मृग था। सोने के रंग में ढला उसका सुंदर सजीला बदन; माणिक, नीलम और पन्ने की कांति की चित्रांगता से शोभायमान था। मखमल से मुलायम उसके रेशमी बाल, आसमानी आँखें तथा तराशे स्फटिक-से उसके खुर और सींग सहज ही किसी का मन मोह लेने वाले थे। तभी तो जब भी वह वन में चौकडियाँ भरता तो उसे देखने वाला हर कोई आह भर उठता।

जाहिर है कि रुरु एक साधारण मृग नहीं था। उसकी अप्रतिम सुन्दरता उसकी विशेषता थी। लेकिन उससे भी बड़ी उसकी विशेषता यह थी कि वह विवेकशील था ; और मनुष्य की तरह बात-चीत करने में भी समर्थ था। पूर्व जन्म के संस्कार से उसे ज्ञात था कि मनुष्य स्वभावत: एक लोभी प्राणी है और लोभ-वश वह मानवीय करुणा का भी प्रतिकार करता आया है। फिर भी सभी प्राणियों के लिए उसकी करुणा प्रबल थी और मनुष्य उसके करुणा-भाव के लिए कोई अपवाद नहीं था। यही करुणा रुरु की सबसे बड़ी विशिष्टता थी।

एक दिन रुरु जब वन में स्वच्छंद विहार कर रहा था तो उसे किसी मनुष्य की चीत्कार सुनायी दी। अनुसरण करता हुआ जब वह घटना-स्थल पर पहुँचा तो उसने वहाँ की पहाड़ी नदी की धारा में एक आदमी को बहता पाया। रुरु की करुणा सहज ही फूट पड़ी। वह तत्काल पानी में कूद पड़ा और डूबते व्यक्ति को अपने पैरों को पकड़ने कि सलाह दी। डूबता व्यक्ति अपनी घबराहट में रुरु के पैरों को न पकड़ उसके ऊपर की सवार हो गया। नाजुक रुरु उसे झटक कर अलग कर सकता था मगर उसने ऐसा नहीं किया। अपितु अनेक कठिनाइयों के बाद भी उस व्यक्ति को अपनी पीठ पर लाद बड़े संयम और मनोबल के साथ किनारे पर ला खड़ा किया।

सुरक्षित आदमी ने जब रुरु को धन्यवाद देना चाहा तो रुरु ने उससे कहा, “अगर तू सच में मुझे धन्यवाद देना चाहता है तो यह बात किसी को ही नहीं बताना कि तूने एक ऐसे मृग द्वारा पुनर्जीवन पाया है जो एक विशिष्ट स्वर्ण-मृग है; क्योंकि तुम्हारी दुनिया


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सोने का हंस


वाराणसी में कभी एक कर्त्तव्यनिष्ठ व शीलवान् गृहस्थ रहा करता था । तीन बेटियों और एक पत्नी के साथ उसका एक छोटा-सा घर संसार था । किन्तु अल्प-आयु में ही उसका निधन हो गया । मरणोपरान्त उस गृहस्थ का पुनर्जन्म एक स्वर्ण हंस के रुप में हुआ । पूर्व जन्म के उपादान और संस्कार उसमें इतने प्रबल थे कि वह अपने मनुष्य-योनि के घटना-क्रम और उनकी भाषा को विस्मृत नहीं कर पाया ।

पूर्व जन्म के परिवार का मोह और उनके प्रति उसका लगाव उसके वर्तमान को भी प्रभावित कर रहा था । एक दिन वह अपने मोह के आवेश में आकर वाराणसी को उड़ चला जहाँ उसकी पूर्व-जन्म की पत्नी और तीन बेटियाँ रहा करती थीं । घर के मुंडेर पर पहुँच कर जब उसने अपनी पत्नी और बेटियों को देखा तो उसका मन खिन्न हो उठा क्योंकि उसके मरणोपरान्त उसके परिवार की आर्थिक दशा दयनीय हो चुकी थी ।

उसकी पत्नी और बेटियाँ अब सुंदर वस्रों की जगह चिथड़ों में दिख रही थीं । वैभव के सारे सामान भी वहाँ से तिरोहित हो चुके थे । फिर भी पूरे उल्लास के साथ उसने अपनी पत्नी और बेटियों का आलिंगन कर उन्हें अपना परिचय दिया और वापिस लौटने से पूर्व उन्हें अपना एक सोने का पंख भी देता गया, जिसे बेचकर उसके परिवार वाले अपने दारिद्र्य को कम कर सकें । इस घटना के पश्चात् हँस समय-समय पर उनसे मिलने वाराणसी आता रहा और हर बार उन्हें सोने का एक पंख दे कर जाता था।

बेटियाँ तो हंस की दानशीलता से संतुष्ट थी मगर उसकी पत्नी बड़ी ही लोभी प्रवृत्ति की थी। उसने सोचा क्यों न वह उस हंस के सारे पंख निकाल कर एक ही पल में धनी बन जाये। बेटियों को भी उसने अपने मन की बात कही। मगर उसकी बेटियाँ ने उसका कड़ा विरोध किया।

अगली बार जब वह हंस वहाँ आया तो संयोगवश उसकी बेटियाँ वहाँ नहीं थी। उसकी पत्नी ने तब उसे बड़े प्यार से पुचकारते हुए अपने करीब बुलाया।

नल-प्रपंच के खेल से अनभिज्ञ वह हंस खुशी-खुशी अपनी पत्नी के पास दौड़ता चला गया। मगर यह क्या। उसकी पत्नी ने बड़ी बेदर्दी से उसकी गर्दन पकड़ उसके सारे पंख एक ही झटके में नोच डाले और खून से लथपथ उसके शरीर को लकड़ी के एक पुराने में फेंक दिया। फिर जब वह उन सोने के पंखों को समेटना चाह रही थी तो उसके हाथों सिर्फ साधारण पंख ही लग सके क्योंकि उस हंस के पंख उसकी इच्छा के प्रतिकूल नोचे जाने पर साधारण हंस के समान हो जाते थे।

बेटियाँ जब लौट कर घर आयीं तो उन्होंने अपने पूर्व-जन्म के पिता को खून से सना देखा; उसके सोने के पंख भी लुप्त थे। उन्होंने सारी बात समझ ली और तत्काल ही हंस की भरपूर सेवा-शुश्रुषा कर कुछ ही दिनों में उसे स्वस्थ कर दिया।

स्वभावत: उसके पंख फिर से आने लगे। मगर अब वे सोने के नहीं थे। जब हंस के पंख इतने निकल गये कि वह उडने के लिए समर्थ हो गया। तब वह उस घर से उड़ गया। और कभी भी वाराणसी में दुबारा दिखाई न


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चाँद पर खरगोश


गंगा के किनारे एक वन में एक खरगोश रहता था। उसके तीन मित्र थे – बंदर, सियार और ऊदबिलाव। चारों ही मित्र दानवीर बनना चाहते थे। एक दिन बातचीत के क्रम में उन्होंने उपोसथ के दिन परम-दान का निर्णय लिया क्योंकि उस दिन के दान का संपूर्ण फल प्राप्त होता है। ऐसी बौद्धों की अवधारणा रही है। (उपोसथ बौद्धों के धार्मिक महोत्सव का दिन होता है)

जब उपोसथ का दिन आया तो सुबह-सवेरे सारे ही मित्र भोजन की तलाश में अपने-अपने घरों से बाहर निकले। घूमते हुए ऊदबिलाव की नज़र जब गंगा तट पर रखी सात लोहित मछलियों पर पड़ी तो वह उन्हें अपने घर ले आया। उसी समय सियार भी कहीं से दही की एक हांडी और मांस का एक टुकड़ा चुरा, अपने घर को लौट आया। उछलता-कूदता बंदर भी किसी बाग से पके आम का गुच्छा तोड़, अपने घर ले आया। तीनों मित्रों ने उन्हीं वस्तुओं को दान में देने का संकल्प लिया। किन्तु उनका चौथा मित्र खरगोश तो कोई साधारण प्राणी नहीं था। उसने सोचा यदि वह अपने भोजन अर्थात् घास-पात का दान जो करे तो दान पाने वाले को शायद ही कुछ लाभ होगा। अत: उसने उपोसथ के अवसर पर याचक को परम संतुष्ट करने के उद्देश्य से स्वयं को ही दान में देने का निर्णय लिया।

उसके स्वयं के त्याग का निर्णय संपूर्ण ब्रह्माण्ड को दोलायमान करने लगा और सक्क के आसन को भी तप्त करने लगा। वैदिक परम्परा में सक्क को शक्र या इन्द्र कहते हैं। सक्क ने जब इस अति अलौकिक घटना का कारण जाना तो सन्यासी के रुप में वह उन चारों मित्रों की दान-परायणता की परीक्षा लेने स्वयं ही उनके घरों पर पहुँचे।

ऊदबिलाव, सियार और बंदर ने सक्क को अपने-अपने घरों से क्रमश: मछलियाँ; मांस और दही ; एवं पके आम के गुच्छे दान में देना चाहा। किन्तु सक्क ने उनके द्वारा दी गयी दान को वस्तुओं को ग्रहण नहीं किया। फिर वह खरगोश के पास पहुँचे और दान की याचना की। खरगोश ने दान के उपयुक्त अवसर को जान याचक को अपने संपूर्ण शरीर के मांस को अंगीठी में सेंक कर देने का प्रस्ताव रखा। जब अंगीठी जलायी गयी तो उसने तीन बार अपने रोमों को झटका ताकि उसके रोमों में बसे छोटे जीव आग में न जल जाएँ। फिर वह बड़ी शालीनता के साथ जलती आग में कूद पड़ा। सक्क उसकी दानवीरता पर स्तब्ध हो उठे। चिरकाल तक उसने ऐसी दानवीरता न देखी थी और न ही सुनी थी। हाँ, आश्चर्य ! आग ने खरगोश को नहीं जलाया क्योंकि वह आग जादुई थी; सक्क के द्वारा किये गये परीक्षण का एक माया-जाल था।

सम्मोहित सक्क ने तब खरगोश का प्रशस्ति गान किया और चांद के ही एक पर्वत को अपने हाथों से मसल, चांद पर खरगोश का निशान बना दिया और कहा, “जब तक इस चांद पर खरगोश का निशान रहेगा तब तक हे खरगोश ! जगत् तुम्हारी दान-वीरता को याद रखेगा।”


Bhikshu Katha (गौतम बुद्ध की कहानियाँ)

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कठोर वचन


एक बार गौतम बुद्ध से अभय राजकुमार ने प्रश्न किया कि क्या श्रमण गौतम कभी कठोर वचन कहते हैं? उसने सोच रखा था कि नहीं कहने पर वह बताएगा कि एक बार उन्होंने देवदत्त को नरकगामी कहा था और यदि हां कहे तो उसने पूछा जा सकता है कि जब आप कठोर शब्दों का प्रयोग करने से स्वयं को रोक नहीं पाते, तब दूसरों को ऐसा उपदेश कैसे देते हैं?

बुद्ध ने अभय के प्रश्न का आशय जान लिया। उन्होंने कहा, इसका उत्तर न तो हां में दिया जा सकता है और न नहीं में। अभय की गोद में उस समय एक छोटा बालक था। उसकी ओर इशारा करते हुए बुद्ध ने पूछा, ‘राजकुमार, यदि दाई के अनजाने में यह बालक अपने मुख में काठ का टुकड़ा डाल ले, तब तुम क्या करोगे?’

‘मैं उसे निकालने का प्रयास करूंगा।’ ‘यदि वह आसानी से न निकल सकता हो तो?’ तो बाएं हाथ से उसका सिर पकड़कर दाहिने हाथ की उंगली को टेढ़ा करके उसे निकालूंगा।’ यदि खून निकलने लगे तो?’ तो भी मेरा यही प्रयास रहेगा कि वह काठ का टुकड़ा किसी न किसी तरह बाहर निकल आए।’ ऐसा क्यों?’ इसलिए कि भंते, इसके प्रति मेरे मन में अनुकंपा है।’ राजकुमार, ठीक इसी तरह तथागत जिस वचन के बारे में जानते हैं कि यह मिथ्या या अनर्थकारी है और उससे दूसरों के हृदय को ठेस पहुंचती है, तब उसका वे कभी उच्चारण नहीं करते। पर इसी तरह जो वचन उन्हें सत्य और हितकारी प्रतीत होते हैं तथा दूसरों को प्रिय लगते हैं, उनका वे सदैव उच्चारण करते हैं।

इसका कारण यही है कि तथागत के मन में सभी प्राणियों के प्रति अनुकंपा है।’


गौतम बुद्ध की कहानियाँ

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वृक्ष का सम्मान


गौतम बुद्ध एक दिन एक वृक्ष को नमन कर रहे थे। उनके एक शिष्य ने यह देखा तो उसे हैरानी हुई। वह बुद्ध से बोला-भगवन! आपने इस वृक्ष को नमन क्यों किया?’

शिष्य की बात सुनकर बुद्ध बोले- ‘क्या इस वृक्ष को नमस्कार करने से कुछ अनहोनी घट गई?’

शिष्य बुद्ध का जवाब सुनकर बोला- ‘नहीं भगवन। ऐसी बात नहीं है, किंतु मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि आप जैसा महान व्यक्ति इस वृक्ष को नमस्कार क्यों कर रहा है? वह न तो आपकी बात का जवाब दे सकता है और न ही आपके नमन करने पर प्रसन्‍नता व्यक्त कर सकता है।’

बुद्ध हल्का सा मुस्करा कर बोले- ‘वत्स ! तुम्हारा सोचना गलत है। वृक्ष मुझे जवाब बोल कर भले न दे सकता हो, किंतु जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के शरीर की एक भाषा होती है, उसी प्रकार प्रकृति और वृक्षों की भी एक अलग भाषा होती है। अपना सम्मान होने पर ये झूमकर प्रसन्‍नता और कृतज्ञता दोनों ही व्यक्त करते हैं। इस वृक्ष के नीचे बैठकर मैंने साधना की, इसकी पत्तियों ने मुझे शीतलता प्रदान की, धूप से मेरा बचाव किया। हर पल इस वृक्ष ने मेरी सुरक्षा की।

इसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना मेरा कर्तव्य है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति के प्रति सदैव कृतज्ञ बने रहना चाहिये, क्योंकि प्रकृति व्यक्ति को सुंदर व सुघड़ जीवन प्रदान करती है। तुम जरा इस वृक्ष की ओर देखो कि इसने मेरी कृतज्ञता व धन्यवाद को बहुत ही खूबसूरती से ग्रहण किया है और जवाब में मुझे झूमकर यह बता रहा है कि आगे भी वह प्रत्येक व्यक्ति की हर संभव सेवा करता रहेगा।

बुद्ध की बात पर शिष्य ने वृक्ष को देखा तो उसे लगा कि सचमुच वृक्ष एक अलग ही मस्ती में झूम रहा था और उसकी झूमती हुई पत्तियां, शाखाएं व फूल मन को एक अद्भत शांति प्रदान कर रहे थे। यह देखकर शिष्य स्वतः वृक्ष के सम्मान में झुक गया।


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बुद्ध के ज्ञान से सेठ ने पाया सुख


धन्ना सेठ के पास सात पुश्तों के पालन-पोषण जितना धन था। उसका व्यापार चारों तरफ फैला हुआ था, किंतु फिर भी उसका मन अशांत रहता था। कभी धन की सुरक्षा की चिंता, तो कभी व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने का तनाव। चिंता और तनाव के कारण वह अस्वस्थ रहने लगा। उसके मित्र ने उसकी गिरती दशा देखी, तो उसे बुद्ध के पास जाने की सलाह दी।

सेठ बुद्ध के पास पहुँचा और अपनी समस्या बताई। बुद्ध ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, “तुम घबराओ मत। तुम्हारा कष्ट अवश्य दूर होगा। बस, तुम यहाँ कुछ दिन रहकर ध्यान किया करो।” बुद्ध के कहे अनुसार सेठ ने रोज ध्यान करना शुरू कर दिया, किंतु सेठ का मन ध्यान में नहीं लगा। वह जैसे ही ध्यान करने बैठता, उसका मन फिर अपनी दुनिया में चला जाता। उसने बुद्ध को यह बात बताई, किंतु बुद्ध ने कोई उपाय नहीं बताया। थोड़ी देर बाद जब सेठ बुद्ध के साथ वन में सायंकालीन भ्रमण कर रहा था, तो उसके पैर में एक काँटा चुभ गया। वह दर्द के मारे कराहने लगा।

बुद्ध ने कहा, “बेहतर होगा कि तुम जी कड़ा कर काँटे को निकाल दो, तब इस दर्द से मुक्ति मिल जाएगी। सेठ ने मन कड़ा कर काँटा निकाल दिया। उसे चैन मिल गया।

तब बुद्ध ने उसे समझाया, ऐसे ही लोभ, मोह, क्रोध, घमंड व द्वेष के काँटे तुम्हारे मन में गड़े हैं। जब तक अपने मन की संकल्प शक्ति से उन्हें नहीं निकालोगे, अशांत ही रहोगे। सेठ का अज्ञान बुद्ध के इन शब्दों से दूर हो गया और उसने निर्मल हृदय की राह पकड़ ली। अपनी कुप्रवृत्तियों से मुक्ति के लिए संकल्पबद्धता अनिवार्य है। जब तक व्यक्ति दृढ़-निश्चय न कर ले, वह अपनी गलत आदतों से मुक्त नहीं हो सकता।


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अमृत की खेती


एक बार भगवान बुद्ध भिक्षा के लिऐ एक किसान के यहां पहुंचे । तथागत को भिक्षा के लिये आया देखकर किसान उपेक्षा से बोला श्रमण मैं हल जोतता हूं और तब खाता हूं तुम्हें भी हल जोतना और बीज बोना चाहिए और तब खाना खाना चाहिऐ

बुद्ध ने कहा महाराज मैं भी खेती ही करता हूं इस पर किसान को जिज्ञासा हुयी बोले गौतम मैं न तुम्हारा हल देखता हूं ना न बैल और नही खेती के स्थल। तब आप कैसे कहते हैं कि आप भी खेती ही करते हैं। आप कृपया अपनी खेती के संबंध में समझाएँ ।

बुद्ध ने कहा महाराज मेरे पास श्रद्धा का बीज तपस्या रूपी वर्षा प्रजा रूपी जोत और हल है पापभीरूता का दंड है विचार रूपी रस्सी है स्मृति और जागरूकता रूपी हल की फाल और पेनी है मैं बचन और कर्म में संयत रहता हूं । में अपनी इस खेती को बेकार घास से मुक्त रखता हूं और आनंद की फसल काट लेने तक प्रयत्नशील रहने वाला हूं अप्रमाद मेरा बैल हे जो बाधाऐं देखकर भी पीछे मुंह नहीं मोडता है । वह मुझे सीधा शान्ति धाम तक ले जाता है । इस प्रकार मैं अमृत की खेती करता हूं।


गौतम बुद्ध की कहानियाँ

मन का मैल


एक वृद्ध भिक्षु और एक युवा भिक्षु दोनों नदी किनारे से चले जा रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि एक युवती नदी में डूब रही है और बचाओ बचाओ के लिए आवाज दे रही है। युवा भिक्षु तुरंत नदी में कृदा और युवती को नदी से बाहर निकाल लाया। इस तरह से उसने उस युवती को बचा लिया। इतने में वृद्ध भिक्षु गरम हो गए, अरे, तुमने उस महिला को छू लिया! अब मैँ तुम्हें बुद्ध से कहूँगा और तुम्हें दंड/प्रायश्चित दिलवाऊँगा दोनों बुद्ध के सामने पहुँचे ।

वृद्ध भिक्षु ने कहा, “भंते ! इसको दंड मिलना चाहिए।” बुद्ध ने पूछा, क्यों?”

वृद्ध भिक्षु ने कहा, इस बात का कि इसने युवती को उठाकर नदी से बाहर रखा, इसने उसे छू लिया, इसका ब्रह्मचर्य नहीं रहा। इसलिए इसे प्रायश्चित्त मिलना चाहिए।”

बुद्ध ने कहा, प्रायश्चित्त पहले तुम ले लो।” “मैं, मैं किस बात का प्रायश्चित लूँ ?” विस्मय से उसने पूछा।

बुद्ध ने कहा, “इसने तो उस महिला को उठाकर वहाँ ही रख दिया पर तुम तो उसे अपने मानस में उठाकर यहाँ तक ले आए तुम्हारे मन में अभी भी यह है, तुम इतनी देर से उसे ढो रहे हो, इसने तो वहाँ रखा और भूल भी गया। सुनो, मैं तुम्हें परिणामों की निर्मलता के लिए यह चार उपाय बताता हूँ– 1. हमेशा मन को स्वस्थ रखना, दूसरों के बारे में विकृत नहीं करना, 2. इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना, 3. अच्छी संगति में रहना, 4. प्रार्थना करना।”


बुद्ध कथाएं

परिश्रम के साथ धैर्य भी


एक बार भगवानबुद्ध अपने अनुयायियों के साथ किसी गांव में उपदेश देने जा रहे थे। उस गांव सें पूर्व ही मार्ग मे उनलोगों को जगह-जगह बहुत सारे गड्ढे खुदे हुए मिले। बुद्ध के एक शिष्य ने उन गड्ढो को देखकर जिज्ञासा प्रकट की, आखिर इस तरह गढे का खुदे होने का तात्पर्य कया है?

बुद्ध बोले,पानी की तलाश में किसी वयक्ति ने इतनें गड्ढे खोदे है। यदि वह धैर्यपूर्वक एक ही स्थान पर गड्ढा खोदता तो उसे पानी अवश्य मिल जाता।

पर वह थोडी देर गड्ढा खोदता और पानी न मिलने पर दूसरा गड्ढा खोदना शुरू कर देता ।

व्यक्ति को परिश्रम करने के साथ धैर्य भी रखना चाहिए।


gautam buddha ki kahaniya

सुख क्या है


एक दिन बहुत से भिक्षु बैठे बात कर रहे थे कि संसार में सबसे बड़ा सुख क्या है ? अगर संसार में सुख ही था तो छोड़कर आए क्‍यों ? जब संसार में दुःख ही दुःख रह जाए, तभी तो कोई संन्यस्त होता है। जब यह समझ में आ जाए कि यहाँ कुछ भी नहीं है । खाली पानी के बबूले हैं, आकाश में बने इंद्रघनुष हैं, आकाश कुसुम है, यहाँ कुछ भी नहीं है, तभी तो कोई संन्यासी होता है ।

संन्यास का अर्थ ही है, संसार व्यर्थ हो गया है– जानकर, अनुभव से अपने ही साक्षात्कार से । ये भिक्षु ऐसे ही भागकर चले आए होंगे। किसी की पत्नी मर गई होगी। संन्यासी हो गया। किसी का दिवाला निकल गया तो संन्यासी हो गया। अब तुम देखना बहुत से लोग संन्यासी होंगे। फिर कुछ और बचता भी नहीं।

तब बुद्ध भगवान्‌ अचानक आ गए। पीछे खड़े होकर उन्होंने भिक्षुओं की बातें सुनीं। चौंके ! फिर कहा, भिक्षुओ, भिक्षु होकर भी यह सब तुम क्या कह रहे हो । यह सारा संसार दुःख में है। इसमें तुम बता रहे हो। कोई कह रहा है राज्य-सुख कोई कहता है काम सुख-दुःख में है। इसमें तुम बता रहे हो, कोई कह रहा भोजन-सुख। स्वाद सुख; यह सब तुम जो कह रहे हो क्या कह रहे हो ? यह सुनकर मुझे आश्चर्य होता है। अगर इस सब में सुख है तो तुम यहाँ आ क्यों गए। सुख भी आभास है ।” बुद्ध ने कहा, ‘ “दुःख सत्य है। और सुख नहीं है ऐसा नहीं। पर संसार में नहीं है। संसार का अर्थ ही है, जहाँ सुख दिखाई पड़ता है। और है नहीं। जहाँ आभास होता है, प्रतीति होती है, इशारे मिलते हैं कि है। लेकिन जैसे-जैसे पास जाओ, पता चलता है, नहीं है ।”

“फिर सुख कहाँ है ?” बुद्ध ने कहा, ”बुद्धोत्पाद में सुख है। तुम्हारे भीतर बुद्ध का जन्म हो जाए, तो सुख है । तुम्हारे भीतर बुद्ध का अवतरण हो जाए तो सुख है । बुद्धोत्पाद, यह बड़ा अनूठा शब्द है । तुम्हारे भीतर बुद्ध उत्पन्न हो जाएँ। तो सुख है। तुम जब जाओ तो सुख है। सो


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ओम् सोमपुत्राय विद्महे महाप्रज्ञाय यदीम्ये तनो बुद्धं प्रजोदयायहाँ हम सभी अपने आप को एक प्रसिद्ध व्यक्ति को सुनने के लिए इकट्ठा करते हैं जिसने हमें जीवन के बारे में देखने के लिए एक नई दृष्टि दी जो गौतम बुद्ध है उनके जीवन के बारे में अधिक जानने के लिए कहानियों को पढ़ना चाहिए गौतम बुद्ध की कहानियाँ . बुद्ध ने हमेशा अहिंसा और शांति का संदेश स भी को दिया, जो पूरी दुनिया से सेवानिवृत्ति लेने के लिए संबंधित एक कहानी है जहाँ वह एक राजघराने का बेटा है और उसकी देखभाल बहुत अच्छी तरह से की जाती है उसके चारित्र के बारे में जानने के लिए आपको download करणी चाहिए buddha ki kahaniya.उनके पिता को एक ज्योतिषी से पता चला कि उनका बेटा इस संसार को छोड़ देगा जब उसे जीवन की सच्चाई के बारे में पता चलेगा इस पूरी दुनिया में आपके साथ कुछ भी नहीं आनेवाला है बुद्ध कथाएं हम सभी को प्रेरणा देता है. इससे बचने के लिए उन्होंने सुनिश्चित किया कि सिद्धार्थ उनके बेटे को इस जीवन का अंत है ये शरीर पुराना होने जा रहा है और बीमारियाँ भी होंगी इससे पहले कि वह सुनिश्चित करता कि उसकी शादी हो चुकी थी और वह राज्य की जिम्मेदारी संभाल रहा था अधिक अंतर्विरोधी कहानियों के लिए गौतम बुद्ध की कहानियाँ .हम बुद्ध से जुड़ी और भी रोचक कहानियाँ लाएँगे please download stories from बुद्ध कथाएं 2021

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गौतम बुद्ध एक कहानी के साथ शुरू होता है एक गाँव था जहाँ लोग खुशियों के साथ रह रहे थे हर जगह हरियाली थी जो बहुत सुंदर थी अधिक अंतर्विरोधी कहानियों के लिए download गौतम बुद्ध की कहानियाँ . दिन के समय हर कोई घूमना पसंद करेगाएक दिन दो यात्रियों ने तमीम किया और गाँव की सुंदरता को देखकर चकित हो गए और दो दिन वहाँ रहने का निश्चय किया इसके लिए वे एक ग्रामीण के घर गए और उनसे पूछा कि वे यहां रह सकते हैं ग्रामीण ने बताया कि अतिथि उनके भगवान के समान हैं इन कहानियों से कोई भी सीख सकता है कि समाज में कैसे व्यवहार किया जाए buddha ki kahani उनकी मदद करेगी.दोनों यात्री ने ग्रामीणों के घर पर दोपहर का भोजन किया और गांव और उसकी सुंदरता का पता लगाने के लिए गए लेकिन उन्होंने देखा कि शाम के समय हर कोई यहाँ वाह भाग रहा था उन्होंने पूछने की कोशिश की लेकिन किसी ने भी उन्हें जवाब नहीं दिया अधिक जानकारी के लिए download कहानियों गौतम बुद्ध की कहानियाँ

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ग्रामीणों में से एक ने उन्हें बताया कि गौतम बुद्ध की कहानियाँ रात के समय एक दानव आता है और उत्पीड़न करता है और डकैती करथा यह सुनकर कि यात्री डर गया और पूरी रात सो नहीं पाया अधिक जानकारी के लिए पढ़ना buddha ki kahani गौतम बुद्ध उस गाँव में आए और लोगों ने उन्हें दानव के बारे में अपनी कहानी बताई उसने उन्हें बताया कि दानव अब से उन्हें परेशान नहीं करेगा रात के समय में गौतम बुद्ध ध्यान कर रहे थे दानव आया और बुद्ध को परेशान करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन वह ऐसा करने में सक्षम नहीं था, क्योंकि बुद्ध ने उसे बताया कि एक पेड़ मौजूद था बस शाखाओं से पत्तियों को अलग करें और उन्हें ठीक करने का प्रयास करें जैसा कि वे पहले थे उन्हें उस दिन से सबक मिला जिसके बाद से उन्होंने सभी की मदद करना शुरू कर दिया download गौतम बुद्ध की कहानियाँ for that

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गौतम बुद्ध सदैव एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करते थे और सभी को धर्म का संदेश देते थे gautam buddha ki kahaniya हमें उनके बारे में और जानने में मदद करेगा . लोग अपनी समस्याओं के साथ बुद्ध के पास आते हैं और बुद्ध हमेशा समस्या के समाधान के लिए उपयोग करते हैं। एक गरीब व्यक्ति था जो वहाँ पर रहता था और लोगों को अपनी समस्या हल करते देखता था अधिक कहानियों के लिए कृपया देखें गौतम बुद्ध की कहानियाँ .उस गरीब व्यक्ति ने बुद्ध के पास जाने और अपनी समस्या बताने का फैसला किया और उनके बीच एक समाधान खोजा कि बुद्ध ने उनकी समस्या सुनी और आदमी ने सोचा कि उनकी समस्या हल हो गई है download buddha ki kahani कहानी का अंत जानने के लिए. बुद्ध ने उन्हें जवाब दिया कि आप इस पूरी दुनिया में सबसे खुश व्यक्ति हैं जिसे सुनकर वह व्यक्ति चौंक गया और उसने इसका कारण पूछा तो बुद्ध ने जवाब दिया कि आपके साथ खुशियां हैं जो आप सभी के साथ साझा कर सकते हैं और उन्होंने उससे कहा कि नहीं इस दुनिया में स्थायी है गौतम बुद्ध की कहानियाँ हमें इससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है

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अब यहाँ हम जीवन और उसकी वास्तविकता के बारे में गौतम बुद्ध की कुछ अच्छी शिक्षाओं को सुनने के लिए इकट्ठा होते हैं बुद्ध कथाएं हमें इससे बहुत मदद मिलती है.कहानी शुरू होती है एक गाँव में एक किसान था जो बाढ़ के कारण अपनी फसल बर्बाद हो जाने से बहुत दुखी था और समस्या के समाधान के लिए वह बुद्ध के पास गया और ऐसी कई कहानियों के लिए download गौतम बुद्ध की कहानियाँ .बुद्ध ने उनकी समस्या को गंभीरता से नहीं सुना और उन्होंने कहा कि किसान कहते हैं कि एक मौसम में बारिश नहीं होती है और दूसरे में फसलें बर्बाद हो जाती हैं, जहां बारिश इतनी अधिक हो जाती है कि फसल बर्बाद हो जाती है और आगे उन्होंने अपनी व्यक्तिगत समस्याओं का भी उल्लेख किया। बुद्ध से कुछ समाधान की उम्मीद करते हुए उन्होंने जवाब दिया कि आपकी समस्या का कोई समाधान नहीं है इस तरह की और अधिक रोचक कहानियों के लिए आओ और पढ़ो buddha ki kahaniya.किसान ने बुद्ध को बताया कि उनके उपदेश का कोई फायदा नहीं है क्योंकि वह अपनी समस्या का समाधान करने में असमर्थ थे और उन्होंने बुद्ध की तुलना अन्य पुजारी से कर रहे थे और बताया कि उनके द्वारा किया गया पूजन और यज्ञ उन्हें कुछ समय के लिए खुश करने में मदद करते हैं अंत जानने के लिए read गौतम बुद्ध की कहानियाँ . बुद्ध ने उन्हें उत्तर दिया कि सुख और दुःख हर किसी के जीवन का हिस्सा हैं और कोई भी उन्हें आने से नहीं बचा सकता है लेकिन हम दोनों ही हालत में स्थिर रहने के लिए खुद को तैयार कर सकते हैं gautam buddha ki kahaniya हम इस कहानी से सीखते हैं

बुद्ध कथाएं

गौतम बुद्ध मुख्य रूप से मानसिक शांति पर ध्यान केंद्रित करते हैं और यह उनके शिक्षण के एक आधार स्तंभ में से एक माना जाता है गौतम बुद्ध की कहानियाँ हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं . यह कहानी एक बार से शुरू होती है जब भगवान बुद्ध पूरे भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे अपना संदेश देते समय उन्हें प्यास लगी और उन्होंने अपने शिष्य से उनके लिए पानी लाने का अनुरोध किया गौतम बुद्ध की कहानियाँ हमें इस तरह की कहानियों से और अधिक सीखने को मिलता है .शिष्य ने देखा कि लोग नदी के तट पर अपने कपड़े धोना और अपने जानवरों को नहलाना जो पानी को गंदा कर रहे थे शिष्य सोच रहा था कि उसे बुद्ध के लिए पानी ले जाना चाहिए लेकिन यह गंदा था कि वह अपने आश्रम में वापस चला गया जहाँ बुद्ध अपना उपदेश दे रहे थे अधिक जटिल कहानियों के लिए buddha ki kahani बुद्ध ने अपने दूसरे शिष्य को उसी स्थान पर भेजा और उससे कहा कि उसके लिए पानी लाओ क्योंकि वह बहुत प्यासा था, दूसरे शिष्य ने उसी स्थान पर लोगों द्वारा की गई सक्रियता को देखा उन्होंने उसे बुद्ध द्वारा दिए गए उपदेश का उपयोग किया कि वह पानी के अंदर गंदगी का इंतजार कर रहे थे ताकि वह पीने के लिए बुद्ध के लिए कुछ शुद्ध पानी ले सकें बुद्ध कथाएं कहानी यहीं समाप्त होती है. buddha ki kahani हमें सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए अपने जीवन में धैर्य रखने की गुणवत्ता सीखने को मिलती ह

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गौतम बुद्धा की कहानिया से हमे बोहोत सिख मिलती है इसकेलिए हम आपकेलिए ये पोस्ट जो की गौतम बुद्ध की कहानियाँ पर आधारित है वो लाए है | इस पोस्ट मई गौतम बुद्धा पर आधारित बोहोत ही बढ़िया कहानिया लिखी गयी है जो आपको भपुर प्रेरणा देगी और आपको जीवन जीने की सिख भी मिलेगी | gautam buddha ki kahaniya इस पोस्ट को आप सोशल मीडिया पर शेयर कर सकते है अपने दोस्तों के साथ | अगर आपको गौतम बुद्ध की कहानियाँ ये पोस्ट पसंद अत है तोह हमे जरूर बताये ताकि हम इस पोस्ट को और अपडेट करते है ऐसेही रचनात्मक buddha ki kahani के साथ buddha ki kahaniya

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